चमकती चकाचौन्द की दिल्ली इस प्रहर सर्द गरमा रहा
चमकती केश की धरा में मैं प्रति जुगनू जल बुझ रहा
आन्दोलन के समीप ही ये कैसी अटखेलइंया लगाता रहा
भारत के नीव में ‘मैं’ से ये कौन कराह रहा?
शुन्य से लटका मनुष्य ऐसा क्या टटोल रहा?
भारत के नीव में ‘मैं’ से ऐसे कौन कराह रहा?
पाताल से शुन्य की ओरे मेरा घुमाव बड़ी क्षणिक है
बयार के किसी ‘मैं’ में मिल जायूं मेरी यात्रा का प्रतीक है
युग-युग से मैं अनित्य जुगनू इस ‘मैं’ को तलाश रहा
ओह आज कहाँ से आई वोह गर्जना इस मधुमृत धरातल पर?
बारम्बार गूँज रही है वह लय इस जिह्वा पर
सच?
क्या?
यकीन नहीं होता…
मेरी ही ह्रदय से है प्रस्फूटित ये ‘मैं’ चमक धमक की दिल्ली में?